सुंदर कांड · सर्ग 15 · श्लोक 18–37

धुएं से ढकी अग्निशिखा

वाल्मीकि ने बंदी सीता के धीमे पड़ चुके सौंदर्य की तुलना धुएं से ढकी आग की लौ से की। धुआं हटाइए — नीचे उसी सर्ग का दूसरा वर्णन है।

धुएं से ढका वर्णनश्लोक 18 से 27

  • मैले कपड़े पहने हुए, राक्षसियों से घिरी, दुबले शरीर वाली चंद्ररेखा जैसी लग रही थीं।
  • एक ही मैले, पीले कपड़े में लिपटी थीं। धूल-मैल में लिपटी, बिना किसी आभूषण के थीं।
  • काले सांप जैसी चोटी पीठ पर लटककर कमर तक झूल रही थी।
  • मुख आंसुओं से भरा, उदास था।

दोनों वर्णन एक ही सर्ग के हैं — भास्कर के मुताबिक सुंदर कांड के सर्ग 15 में 18 से 37वें श्लोक में हनुमान मां सीता के रूप और वेशभूषा का विस्तार से वर्णन करते हैं। श्लोक संख्याएं गीता प्रेस, गोरखपुर के संस्करण के अनुसार। अग्निशिखा का चित्र ग्रंथ की उपमा पर आधारित रेखाचित्र है।