सुंदर कांड · सर्ग 15 · श्लोक 18–37
धुएं से ढकी अग्निशिखा
वाल्मीकि ने बंदी सीता के धीमे पड़ चुके सौंदर्य की तुलना धुएं से ढकी आग की लौ से की। धुआं हटाइए — नीचे उसी सर्ग का दूसरा वर्णन है।
धुएं से ढका वर्णनश्लोक 18 से 27
- मैले कपड़े पहने हुए, राक्षसियों से घिरी, दुबले शरीर वाली चंद्ररेखा जैसी लग रही थीं।
- एक ही मैले, पीले कपड़े में लिपटी थीं। धूल-मैल में लिपटी, बिना किसी आभूषण के थीं।
- काले सांप जैसी चोटी पीठ पर लटककर कमर तक झूल रही थी।
- मुख आंसुओं से भरा, उदास था।